Saturday, 21 February 2015

जतसार

कविता

अभिज्ञात

जब तक रहती है घर में
सबको ताज़ा खिलाकर
खाती है मां बासी खाना चोरी-चोरी
अन्न फेंका नहीं जाता

नहीं होते उपेक्षित
पुराने कपड़े

धुंधली दृष्टि के बावज़ूद
सहेजकर धरी रहती है सुई
अचार में नहीं लगती है भुअरी

मां
त्योहारों की शृंखला है
मौसम का ब्यौरा
हक़ीम
जांते का गीत

मां का सबसे प्रिय प्राणी है
छछुन्नर
सबसे प्रिय बिछखोपड़ा
क्योंकि वह रंग बदलता है

रंग उतरने की शिकायत
उसे कपड़ों से सबसे अधिक रही है
मां खुद एक रंग है
जो न बदलता है न उतरता है

मां
सबसे पहले जगती है
और सोती है
सबसे अखीर में
जिस पर ध्यान किसी का नहीं जाता

मां एक गणित है
जिसमें सवाल के बाहर के हिसाब हैं।

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