Saturday, 21 February 2015

नींद पर सेंध

कविता

अभिज्ञात

चटकल मज़दूर डरते हैं जादू से

जादू से ग़ायब हो सकती हैं
रातोंरात
मिल में उनके काम करने का हरेक प्रमाण

उनका हिसाब गायब हो सकता है
सिरे से

उन्हें यह भी चाहिए आश्वासन
कि अगर ऐसा हो
तो हो केवल जादू

सुनते हैं, जादू है महज आंख का धोखा
जस-का-तस हो जाता है सब बाद में

चटकल मज़दूर
खूब खूब पहचानते हैं अख़बारनवीसों को
बार-बार आते हैं वे
उनकी खोज खबर को आख़िरकार
वे नहीं सोचते
ऐसा क्या है जिससे
खिंचे चले आते हैं अख़बारनवीस
क्यों हो जाते हैं वे अख़बारों की चीज़


चटकल मज़दूर
हमेशा एक पैर उठाये खड़े रहते हैं भगीरथ की तरह
देस लौटने की तैयारी में

क्या लाने जाते हैं वे सचमुच
महज ठोंकुआ, सतुआ, अचार और भुजना?

हड़ताल और तालाबंदी की ख़बर पा
कहां चले जाते हैं
चटकल के भोजपुरिया मज़दूर कलकत्ता छोड़
दूसरे कहते हैं उन्हें गद्दार
कि उन्हीं के कारण हारते हैं यहां बच जाने वाले
वे नहीं जानते
उन्हीं भगोड़ों के कारण चलती रहती है चुपचाप
राजनीति की दुकानें

लम्बे सोने के सूत हैं या सपने
जिन्हें अपनी नींद तक में कातते हैं चटकल मज़दूर
मिल की ऊंची चिमनियां हैं
जो उनके फेफड़ों के लिए
उगल रही हैं आक्सीजन
वे कौन हैं जो उनकी नींद और आक्सीजन पर लगा रहे हैं सेंध?

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