Saturday, 21 February 2015

धूप हमारी आंखों पर खड़ी है

कविता

अभिज्ञात

मुश्किल तो ये है कि धूप
अपने पांवों पर नहीं
हमारी आंखों पर खड़ी है
हम मूंद लेते हैं आंख
और वह धम्म देना एक तलहटी में गिर जाती है
अपने ओर-छोर के साथ

यह विस्मय है कि फिर भी
वह छू लेती हैं अपनी बारीक नहों से
और धकिया देती है हमारी अपनी तैयारी की ओर

हमारी अपनी तैयारी की केन्द्र
मोतियाबिन्द है
मोतियाबिन्द के बाद
धूप भरे मौसम में देखना
एक सम्मोहन में जीना है।

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