Saturday, 21 February 2015

जिसके लिए ढली है भाषा

कविता

अभिज्ञात

इससे पहले कि बाहर चांद
और घर की मोमबत्ती का प्रकाश
पिघल कर रीत जाये
तुम मेरी अंजुरी में धर दो एक बात
बात, जो टांकी जानी है
अबकी सावन में झलुआ पर पटेंग मारती कजरी में
बात, जो गूंथी जानी है आटे के साथ चौके में
रगड़ी जायेगी तुलसी के पत्ते
और पी जायेगी सतनारायण की कथा के चरणामृत के साथ

बात, जो मेरे कान के लिए ही बनी है
जिसके लिए ही बने हैं तुम्हारे होंठ
ढली है भाषा

धर दो अंजुरी में
वही सांवली झबरीली बात
कनखियों से ताकती बात
होठों में सिमटी बात।

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