Friday, 20 February 2015

जब पत्थर एक व्यवस्था हो

कविता

अभिज्ञात


पत्थर संवाद की स्थिति से गुज़र रहे हैं
या
प्रतिध्वनि की
मौन का एक उत्सुक उत्सव
एक नतीजे तक पहुंचा देगा

लेकिन सावधान
कि नतीजे पर पहुंची हुई कोई भी चीज़
पत्थर होने से न बचेगी

पत्थर को एक नतीजे पर लाना
और
फिर नतीजतन पथराना
मौन की अवहेलना के लिए
राजी होना है

तो क्या है और कोई स्थिति
पत्थर की अंतःक्रिया से चुपचाप जुड़ने की
ख़ास तौर पर उस समय तो और भी
जब पत्थर एक व्यवस्था हो
प्रति-व्यवस्था भी

पत्थर के विरुद्ध पत्थर
आग की संभावना है या धमाके की
और इन दोनों के बग़ैर
किसी को चाहिए पत्थर के ख़िलाफ कुछ तो?

नहीं उठ रहा है पत्थर के अर्थ को
नकारने का कोई अर्थ

और सहसा लगा कि
हो सकता है आख़िरी बार सोच रहा होऊं इस पर
मैंने ठाना
पत्थर पर लिख देना चाहिए ठीक से-पत्थर
अपनी भाषा-सामर्थ्य और व्याकरण के साथ
और इस प्रकार हुआ जा सकता है
किसी हद तक आश्वस्त
कि भले मिट जाये शब्द
मगर वहां कुछ तो लिखेगी बरसात
धूप
चांदनी
ओस
पत्थर की अर्थ-तह के बरअक्स।।

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