Friday, 20 February 2015

आक्रमणकारी होती हैं इच्छाएं

कविता

अभिज्ञात


पीपल की नयी ललछौंही पत्ती की तरह
उगी हुई इच्छा
हममें सेंत में व्यक्त नहीं हुई
पहले दुलारा हमने
छुआ हौले से उसने
नाराज़गी ज़ाहिर हुई
चुप क्यों हैं परस्पर

कुछ दिन नेंपी रह सकती तो भी क्या बनता

आक्रमणकारी होती हैं इच्छाएं हमारी लाचारी पर
होती हैं इसलिए बहुवचन

बहुवचन के बाहर जो कुछ भी है
वह व्याकरण द्वारा बुना गया झूठ है
ऐसा माना नहीं
जाना जाता है

देह की मेढ़ रीढ़ की मेढ़ पर
उगती आयी हैं इच्छाओं की फसलें
मेढ़ हद है
कि हद है
और हद है कि तोड़ती रही हैं उसे इच्छाएं
उस पर जमीं हुई

हवा के झोंकों के साथ
बदल देती हैं इच्छाओं की टहनियां, शाखाएं अपना रुख

झड़ती रहती हैं पत्तियां जिस तिस ओर
पीली..हरी।

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