Friday, 20 February 2015

नमी

कविता

अभिज्ञात


न जाने कब
किसी घर का लटकता फैन
गोरखपाण्डे की लाश के साथ
उपस्थित हो जाये
कब किसकी मौत
बदल जाये आत्महत्या में
कहना मुश्किल है

दिल्ली अब भी
हो सकती है विचारवान
वहां विचारों की कमी नहीं
विचारों की नमी है
धूप के बगैर

ये नमी सीलन में बदल सकती है
घुस सकती है लालकिले और संसद में

घुस सकती है
तुम्हारी एड़ियों में
एडि़यों की बिवाइयों में भर सकती है मवाद।
दिल्लीवालो सावधान!!

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