Saturday, 21 February 2015

यह अ-तय दिन

कविता

अभिज्ञात

यह दिन भी तय हो गया
और अ-तय दिनों की तरह
इस दिन भी अप्रासंगिक
स्वप्न संभावना

पढ़ी गयीं बस एक दिन
चिट्ठियां जब-तब की आयीं

बिल्ली काटेगी के भय से सोयी रही बिटिया
स्पप्न में मांगती रही चाक
इस इकहरी निद्रा स्थिति को
स्वयं जिया हमने इस पूरे दिन
न आयी बिल्ली न मिला चाक
हममें से किसी को

एक खौफ़ की अंधी गुफा मे दुबके खरगोश सा हमारा अस्तित्व
एक ऊंची मंचान पर चढ़ा अगोर रहा है
जबकि यह मौसम नहीं है फसल का
सिवानों में बची हैं खुत्थियां तिरछी, खड़ी
कटी फसलों की
यह ताज़ा होरहे की गंध है
जो ख़यालों से छनकर आती है
पश्ती के गझ्झिन दिनों में

यह शनिवार को कटे नाखूनों का प्रकोप है
कहती है पत्नी
बिना यह जाने कि पूरी दुनिया नाखून की नियति की ओर अग्रसर है।

No comments:

Post a Comment