Saturday, 21 February 2015

तुम्हें फ़ुरसत नहीं

कविता

अभिज्ञात

मैं एक मेज़ हूं
जिस पर अपन केहुंनी गड़ाकर
तुम धरती हो
अपने गालों पर हाथ
और सोचती हो
गुज़रे कल के बारे में

एक अंधेरा हूं
जिसके सामने
आंखे खुली रखने का
कोई औचित्य नहीं
न ही उसे निहारने का
और ना ही
उसके बारे में सोचने का
अंधेरा सुविधा है
अतीत की ओर बहने का

एक कमरा
जो तुम्हारा नितांत वैयक्तिक
उसमें
दूसरों की उपस्थिति
तुम्हें खलती है
और ख़ुद आने की
फ़ुरसत नहीं है

एक नाइट लैंप
जो गयी रात तक जलता है
तुम्हारे सिरहाने
जिसके मंद प्रकाश में
तुम देखती हो
एक टूटा मोरपंख, पुराने अलबम
पढ़ती हो
पीली पड़ गयी चिट्ठियां
एक लिहाफ़ जिसमें समाना
सिर्फ़ तुम्हारी सुविधा है

एक खिड़की
जिसमें से तुम झांकती हो
एक टूटे इंद्रधनुष की ओर
तुम्हारे कलेंडर की एक तारीख़
जिस पर
किसी विशेष आशय से
चिह्न लगाकर तुम भूल गयीं
कि क्यों लगाया था

मैं
एक बात
जो तुम्हें ग़लत मौके पर सूझी

एक ख़त
जिसे पढ़कर तुमने
उसी पते पर लौटा दिया
जहां से चला था।

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