Thursday, 19 February 2015

दोपहर

कविता

-अभिज्ञात

दोपहर है
गौरैया है उड़ान पर
सूने हैं उसके घोंसले
खाये भात के हल्के नशे में लेटे हुए हैं
उपनगरों के बंगाली दुकानदार
ओंघाती हुई दुकानों में
दफ़्तरों में बाबू, मौका पा

यह दोपहर है
घर से बाहर निकल पड़ोस में बतियाती हैं औरतें
छतों पर स्वेटर बुनते, पापड़ बनाते
सुखाते हुए अंचार, धोए हुए ब्रत की परसादी के गेहूं

दोपहर है
लगभग अपनी अंतिम नींद पूरी करने की
ताबड़तोड़ कोशिश में हैं अख़बार का प्रूफ़रीडर

यह दोपहर है
चश्मे ख़रीदने की वज़हों में से एक
ढलान के बारे में सोचते लोगों का आतंक

दोपहर में
परछाहीं के बिना सूनी पड़ जाती है काया

ऐसा क्यों है कोई नहीं गाता गीत खड़ी दोपहर के
शीर्ष है रोशनी का
पर कोई नहीं करता अगवानी

यह गति पर विराम है
मगर कोई नहीं देता-धन्यवाद
ऐसा क्या है दोपहर में
इतनी उपेक्षित क्यों है दोपहर?

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