Friday, 20 February 2015

चुम्मा दो

कविता

अभिज्ञात

मेरी प्यारी बेटी चुम्मा दो

चुम्मा दो कि
ज़िन्दगी पुरुवा हवा की तरह बहे
वहां, जहां दर्द पुराने पिराने लगें

पुरुआ इतिहास से
जोड़ती है
जोड़ती है जड़ों तक
जड़ों के उन्माद से
सच तो ये है कि पुरुआ
जोड़ती है इतिहास के उन्माद से

मैं उन्माद की मियाद के
बिखेर दूं तिनके-तिनके

चुम्मा दो कि
एक बाबर्ची संस्कृति के तहत
मूल्यों को स्वाद में
बदल डालने की प्रक्रिया सहज न होने दूं
जो लार संचालित है

चुम्माद दो कि अक्रिया की धौंस देती
जुगाली करती भंगिमाएं
आक्रांत न कर सकें

चुम्मा दो बेटी
अपने दूध गंधी होठों से
कि मेरी कोशिशें कारगर हों
हज़ार हज़ार मांओं और गायों के थन से
उतर आये दूध
तमाम दुनिया के लिए

चुम्मा दो कि मैं
अपनी सारी थकन भूल जाऊं
गढ़ लाऊं अनूठी गगरी
जिसमें तुम भर पाओ
आस के
हास के सारे सपन।

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