Saturday, 21 February 2015

शुक्रवार के बग़ैर जीते हुए

कविता

अभिज्ञात

सीढ़ियों पर मिल गया मुझे
सहसा शुक्रवार
लोगों को हैरत थी
ऐसे भला मिलता है किसी को
एक दिन
समूची अर्थवत्ता के साथ

मगर वह था हैरत को मुंह चिढ़ाते हुए

मंगल से नापो तो बीचोंबीच खड़ा हफ़्ते के
प्रस्थान से नापो तो मंज़िल के
जन्म से मृत्यु के बीच
एक अदद शुक्रवार
अर्थात मेरी पृथ्वी, शहर और जीवन के बीचोंबीच
जहां से हर ओर हो सकती है अनन्त यात्राएं
जहां आकर हो सकती हैं ख़त्म

मेरी दिनचर्या को एक अजीब सम्मोहन से संचालित करता
मेरा आकांक्षा, मेरी पराजय के बीच एक सांत्वना
और धैर्य शुक्रवार
अचानक उस समय मिला
जब मैं हिकारत से देखता हुआ लिफ्ट को
मुड़ गया था सीढ़ियों की ओर

सीढ़ियों पर मिल जाते हैं जैसे
भिखारी के कटोरे में सिक्के
क्या इसी तरह मिला था मुझे
मैंने मन में टटोला
उस समय जब कड़कती ठंड में
मुझे एक गर्म कंबल की ज़रूरत थी घर
और सड़क पर हाथ
एक दिन मुझे पता चला
सीढ़ियों पर मिलने वाले भी
फिसल जाते हैं हाथ से
कट जाते हैं ज़ेब से
लूट लिए जाते हैं तिज़ोरी से
और यह भी कि
बदल दिये जाते है कुछ टटकी
टहटह सुविधाओं से
सिक्के और शुक्रवार।

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