Thursday, 19 February 2015

फिर भी बची है

कविता

अभिज्ञात

आधी-अधूरी सी
सुबह बची थी
उस दरख़्त पर
आधी-अधूरी हरितिमा के रूप में

एक अधूरी सी ज़िन्दगी थी
ख़त्म है अपने अधूरेपन की उच्चता पर

यह खाली गगरियों की एक खनक थी

संदूकची की सीलन भरी गंध

कंबलों का रूखापन त्वचा पर

नाक के बढे हुए बालों के विरुद्ध
सावधानी व नज़ाकत से हुआ
कैंची का बरताव

संखे की चूड़ियों का शगुन

बहराई हुई चुप्पी
चींटियों की ढोआई
फिर भी बची है।


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