Thursday, 19 February 2015

हरियाली, पीठ और कविता

कविता

अभिज्ञात

भाई हो सके तो
हरियाली की फ़िक्र करो

अपने-आप खिले जायेंगे फूल
पक जायेंगे फल
हरियाली को कच्ची मत छोड़ो
मत छोड़ो अकेला़

हरे का अकेला छूट जाना
है छूट जाना संभावना का अकेले

अकेली, नि-संग अकेली संभावना
किसी बांझपन को चुपचाप ढोती है
जैसे पीठ
कुछ न कुछ हमेशा
बिना किसी असबाब के
स्वयं अपने आप को

बांझ पीठ का ढोया जाना
हरियाली के लिए ख़तरा है

कुछ न कुछ खोज लो असबाब

आख़िर पीठ पड़ जानी है अकेली
तुक मिलाने से न डरो
वह केवल कविता का कसीदा नहीं है
कविता शाब्दिक तुक मिलाये न मिलाये
वह भी मिलायेगी जीवन से
हरियाली और पीठ की तरह
अकेली निःसंग होने से

हरियाली, पीठ और कविता
तीनों को अलग-अलग मत छोड़ो
और हां फिर कहता हूं!!
मत करो फ़िक्र और फल की

वे ख़ुद-ब-ख़ुद पहुंचेंगे
सही समय पर
प्रतीक्षा न करो
बस इसे जानो
प्रतीक्षा में खो जानी है हरियाली
कठुआ जानी है पीठ
और कविता
उसे तुम ठुमरी कह सकोगे।

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