Saturday, 21 February 2015

साझेदारी का न्योता

कविता

अभिज्ञात

सबसे पहले अपनी बात
मैंने धूल से कही
क्योंकि धूल से अंत में हुई बात
धूल होती है

धूल से पहले पहल मिलना
कम से कम शहर में
निहायत ज़रूरी है
और ख़तरनाक़
क्योंकि
वह तुम्हारे परिचय पर
बड़ी आत्मीयता के साथ
छाई होती है
और समय के साथ-साथ
पक कर झर जाती है
तुम्हारी ज़मीन के पकने से पहले
बशर्ते वह ठोस और पुख़्ता हो

धूल का पहला रिश्ता
आंखों से बनता है
और आंख
हर रिश्ते के लिए ज़िम्मेदारी होती है
क्योंकि आंख के पास
खुले रहने की बेचैनी होती है
और सार्थकता

आंख की इस अनवरत यात्रा में
धूल का रिश्ता प्राथमिक स्तर पर
आमंत्रण और पड़ाव का होता है

इसलिए धूल से कहता हूं
अपनी बात
कि
वह ख़ुद ब ख़ुद पहुंचा देगी
मेरा संदेश
बेचैन आंखों तक
कि मेरी ज़मीन का न्योता है
अनन्त साझेदारी का।

No comments:

Post a Comment