Thursday, 19 February 2015

पहाड़ प्रतीक्षा का कैसे दिखाऊंगा...

कविता

अभिज्ञात

यह दातूनों की मांज से चमके हुए दांत की सुबह
चाय की प्रतीक्षा में रुकी हुई तमाम हलचलों के बावज़ूद
है

यह खाली गगरियों को भरने की बेला
कंबल के रूखेपन को
अपनी त्वचा पर महसूसने का अंतिम क्षण

किसी बच्ची के नन्हे हाथ की थपकी के चमत्कार से भरी हुई सुबह
क्या सचमुच ठहर पायेगी

मेरी अनगिनत सुबहों के तमाम स्थगित वर्षों की थानों को
तुम जिस संदूकची में बंद करती गयी हो
उसे चाट न जायें दीमक
फिर...पहाड़ प्रतीक्षा का कैसे दिखाऊंगा?

No comments:

Post a Comment