Thursday, 19 February 2015

दी हुई नींद

कविता

अभिज्ञात

मैं खरीफ की फसल के बाद
सोऊंगा
सोऊंगा ज़रूर रबी की फसल के बाद
हहकारते खाली खलिहानों को
भर देने के बाद अन्न धन से

अन्न को अलगिया देने के बाद
पुआलो से
मैं होरहे की गंध के साथ सोऊंगा

बादल को न्योत लूं पहले
सूर्य को दे लूं अर्घ
घूर पर बार लूं दिये
ता लूं तमाम मूसों के बिल

फिर
फिर मैं सोऊंगा

मैं सोने के लिय ही तो करूंगा यह सब

कभी-कभी सोचता हूं
कि यदि न आने वाली होती नींद
तो
तो मैं क्या ज़वाब देता
अपनी हड़बड़ी का

यदि न आने वाली होती नींद
तो क्या सचमुच कर रहा होता यह सब
तब मैं क्या सोच रहा होता
यह सब करते हुए

कितना बड़ा आशीर्वाद है भगवन्
तेरी यह दी हुई नींद


No comments:

Post a Comment