Sunday, 18 January 2015

वापसी पराजय नहीं

कविता
-डॉ.अभिज्ञात
वापसी हो
टूटती लय की
रागिनी पर
आराम की
सिलवटें झाड़े बिस्तरों पर

मुस्कान की
थकी, उबासी लेती मनःस्थिति पर

टहनी पर वापसी
ऊंची उड़ान के बाद परिंदे की


अब हो वापसी, शब्दों में
कोमल संवेदनशील अर्थ की
जिसे छोड़कर भाग गये थे
नारों के डर से

सत्य में
सही आशय की
जो ग़लत समय में
ग़लत संदर्भ में, जाने जाते रहे बहुत बार।

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