Monday, 6 September 2010

चैता

कविता

अभिज्ञात

आलू मंडी में पहुंच चुके हैं
कसे जा चुके हैं बोरों में
गेहूं की बालियां खड़ी हैं खेतों में
रात-भर सिवान में सोता है हरवाह
पहरेदारी में

होरहे की गंध फिज़ा में तर है
और सबके चेहरे पर है उत्साह
रामनवमी है और रोहुआं गांव में है चैता
दुबे के दुआरे गांव-जवार से जुट गये हैं चालीस जोड़ी झाल
आख़िर तड़के ही निकले थे लोग
शाम होते-होते तय कर लिया लवंडा भी
जो तिवारी गांव में तमाटर का खेत अगोरता मिला
खुश हैं उसे देख सब
मुछें हैं सफाचट
जुल्फ़ें हैं बड़ी-बड़ी, एकदम चलेगा जी
रात सवा दस बजते-बजते शुरू हो गया
चैता
एक ओर है रोहुआं-तिवारी दूसरी ओर मेघा
पुरास, बहुआरा, बिगहीं, छितौनी
शुरू हुआ चैता
गा रहा है व्यास
व्यास की वक्राकार अंगुलियों पर
चालीस जोड़ी झाल पीटते झूम रहे हैं लोग
लवंडा बीच-बीच में लगा रहा है झटके
ताल की समरसता पर ओंघा रहे हैं सुनने वाले, दूर गांव से आये बूढ़े जवान
कभी-कभी झपकी तोड़ देती है टांसी बूढ़े की
खूब घी पिया है पट्ठे ने
सोचते हैं युवक, ऐसा लगे निकल आयेगा कलेजा टांसी का
एकाएक नींद तोड़ने को व्यास गाता है लटका
आंखे धोते अचानक उठते हैं सुनने वाले
उनकी नींद और सपनों में
बाद के कई महीनों तक पीछा करती है हो रामा की लम्बी तान
जिसे नापने का कोई पैमाना नहीं
कितनी लम्बी गयी तान
क्योंकि व्यास के पास हारमोनियम नहीं था
यह परखने का कोई उपाय नहीं था कि वह कितनी काली गयी उसकी आवाज़
कितना हुई बेसुरा
और इसकी गरज न थी
ठेठ चैता था-जिस पर झूम रहा था
पूरा गांव-जवार
भीतर-बाहर फैला था-चैता।

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