Wednesday, 15 September 2010

तुमने मुझे जाना है

कविता

अभिज्ञात


कभी तुम
सूंघो
मेरी नाक से
गुलाब, मोगरा, गेंदा और अपने-आपको
छुओ
मेरे हाथों से
कविताओं की डायरी
मुझे भेंट की गयी पहली क़िताब
लो
मेरे ही होठों से
तुम अपना नाम
पहला, दूसरा और प्राइवेट वाला भी
करो
मेरे ही कानों से
अपने क़दमों के आहट की प्रतीक्षा
तब मैं जानूं
तुमने मुझे जाना है।

3 comments:

  1. सच कहा आपने , किसी को गहराई से समझने के लिए पूरी तरह उसमें डूब जाना पडता है..... बहुत ही हृदय स्पर्शी कविता.

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  2. क्या बात है..वाह!

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  3. आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा. हिंदी लेखन को बढ़ावा देने के लिए आपका आभार. आपका ब्लॉग दिनोदिन उन्नति की ओर अग्रसर हो, आपकी लेखन विधा प्रशंसनीय है. आप हमारे ब्लॉग पर भी अवश्य पधारें, यदि हमारा प्रयास आपको पसंद आये तो "अनुसरण कर्ता" बनकर हमारा उत्साहवर्धन अवश्य करें. साथ ही अपने अमूल्य सुझावों से हमें अवगत भी कराएँ, ताकि इस मंच को हम नयी दिशा दे सकें. धन्यवाद . आपकी प्रतीक्षा में ....
    भारतीय ब्लॉग लेखक मंच
    डंके की चोट पर

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