Friday, 3 September 2010

रिश्ता

कविता

अभिज्ञात


किसी भी समय दिख जाता है वह
अलस्सुबह, दोपहर, सांझ या रात में
उसके कंधे पर लदी होती हैं
कुर्सियां, सिर पर मेज़, हाथ में छोटा स्टूल
पीली मिट्टी पुते फ़र्नीचर
कच्ची लकड़ियों के

आदमी के ऊपर लदा फ़र्नीचर
कोई विस्मय पैदा नहीं करता, किसी में भी

आदमी फ़र्नीचर से लदा होता है
साधारण, बाबू किस्म का आदमी
वह भी जो फ़र्नीचर से लदा होता है
महसूस करता है फ़र्नीचर का बोझ

कैसा अद्भुत तादात्म्य है
लदा होना आदमी और फ़र्नीचर का
एक-दूसरे पर परस्पर एक साथ

फ़िलहाल वह जो बेच रहा है फ़र्नीचर
वह फ़र्नीचर ढो रहा है
फ़क्त वही

वह क्षण भर को सुस्ताने बैठता है
तो रख देता है ज़मीन पर मेज़, कुर्सियां, स्टूल खाली
और बैठ जाता है उकड़ूं
ज़मीन पर, कहीं छांह देख

कभी-कभी वह ले आता है
लकड़ी की अलगनी
मोहल्ले की औरतें जब करने लगती हैं मोल-भाव
कई बार वह कंधे पर अलगनी लिए-लिए
स्तब्ध खड़ा रह जाता है
मन में कुछ गुनता सा
पसीने से तर-ब-तर
मूर्तिवत्
उस समय लगता है
अलगनी पर कुछ गीले कपड़े लटक रहे हैं
और एक खोया सा मुखौटा
उसकी खूंटी पर टंगा है

कभी-कभी वह हद ही कर देता है
सिर पर पगड़ी रख लदा लेता है
मझोले कद की आलमारी
औरतें-बच्चे हंसते हैं
आलमारी इस तरह बेची जाती देख

वह बाज़ार नहीं जानता
न बाज़ार के नियम
ग्राहक और बाज़ार की परस्पर निर्भरता का अनिवार्य रिश्ता
जो आदमी को कभी-कभी
बाज़ार में छोड़ देता है बिचौलिए की तरह
और कभी-कभी
आदमी को ख़ुद हो जाना पड़ता है
बाज़ार

जब बहुत दिनों तक नहीं बिकते
उसके फ़र्नीचर
गीली-कच्ची लकड़ियों के पीले-फ़र्नीचर
उसका चेहरा पीला पड़ जाता है
फ़र्नीचर के रंग से
एकदम मेल खाने लगता है
और यही नहीं
सूखकर जगह-जगह से
टेढ़े होने लगते हैं फ़र्नीचर
उसका ज़िस्म फ़र्नीचरों के साथ-साथ
बेडौल होने लगता है
झुका-झुका सा।

3 comments:

  1. आपकी खूबसूरत पोस्ट को ४-९-१० के चर्चा मंच पर सहेजा है.. आके देखेंगे क्या?

    ReplyDelete
  2. बहुत गहरी रचना.

    ReplyDelete
  3. बहुत ही अच्छी कविता. मैं काफी पहले से हंस वागार्थ कथादेश आदि का पाठक रहा हूं व आप की कुछ कवितायें पढी है.आप के बारे में यहां बहुत कुछ जानने को मिला.घन्यवाद चर्चामंच का जो आपके ब्लाग का लिंक मिला.

    (upendra- www.srijanshikhar.blogspot.com)

    ReplyDelete