Wednesday, 1 September 2010

उम्र

कविता

अभिज्ञात


अर्जित की जाती है
कंजूस बनिए सी
ख़र्च
सूद में से
टूट जाती है
आईने की तरह अचानक कच्च से
फूलहा परातों सी होती है उम्र
रखे-रखे ही
पड़ जाती है फ़ीकी जिसकी कलई
भीख सी बंट जाती है
इस-उस कटोरे में
आशीर्वाद की तरह
बिछी रह जाती है कई बार
किसी के लिए प्रार्थना मुद्रा में।

1 comment:

  1. उम्र के बारे में बहुत ही सच्ची बात............

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