Sunday, 29 August 2010

ख़्वाब देखे कोई और

कविता

अभिज्ञात


मेरे साथ ही ख़त्म नहीं हो जायेगा
सबका संसार
मेरी यात्राओं से ख़त्म नहीं हो जाना है
सबका सफ़र

अगर अधूरी है मेरी कामनाएं
तो हो सकता है तुममें हो जायें पूरी

मेरी अधबनी इमारतों पर
कम से कम परिन्दे लगा लेंगे घोंसले

मैं
अपने आधू-अधूरेपन से आश्वस्त हूं

कितना सुखद अजूबा हो
कि
मैं अपनी नींद सोऊं
उसमें ख़्वाब देखे कोई और
कोई तीसरा उठे नींद की ख़ुमारी तोड़ता
ख़्वाबों को याद करने की कोशिश करता।

6 comments:

  1. मंगलवार 31 अगस्त को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ....आपका इंतज़ार रहेगा ..आपकी अभिव्यक्ति ही हमारी प्रेरणा है ... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  2. बहुत खूब ... मैं नींद करूँ, कोई ख्वाब देखे ... ग़ज़ब की कल्पना ...

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  3. कितना सुखद अजूबा हो
    कि
    मैं अपनी नींद सोऊं
    उसमें ख़्वाब देखे कोई और
    कोई तीसरा उठे नींद की ख़ुमारी तोड़ता
    ख़्वाबों को याद करने की कोशिश करता।
    बहुत ही सुंदर ।

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  4. कितना सुखद अजूबा हो
    कि
    मैं अपनी नींद सोऊं
    उसमें ख़्वाब देखे कोई और
    कोई तीसरा उठे नींद की ख़ुमारी तोड़ता
    ख़्वाबों को याद करने की कोशिश करता।
    एक अच्छा ख्वाब

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