कभी तुम
सूंघो
मेरी नाक से
गुलाब, मोगरा, गेंदा और अपने-आपको
छुओ
मेरे हाथों से
कविताओं की डायरी
मुझे भेंट की गयी पहली क़िताब
लो
मेरे ही होठों से
तुम अपना नाम
पहला, दूसरा और प्राइवेट वाला भी
करो
मेरे ही कानों से
अपने क़दमों के आहट की प्रतीक्षा
तब मैं जानूं
तुमने मुझे जाना है।
Wednesday, 15 September 2010
Tuesday, 7 September 2010
गांगी का हाल
मेरा छोटा सा गांव कम्हरियां
दो तरफ़ से एक वर्तुलाकार नदी से घिरा हुआ
गांगी से
क्यों पड़ है नदी का नाम गांगी
मैं नहीं जानता
और अब, जानने का कोई उपाय नहीं
आजी नहीं रही, इस जिज्ञासा के जगने तक
गांव या पास के जीवित कस्बे मेंहनाजपुर से
कोई नहीं देता गांगी की ख़बर
ज़िन्दा लोगों के लिए
बेमतलब सी क्यों हैं नदियां
हैं भी तो ख़बर लायक क्यों नहीं
कैसे पार लेते हैं लोग गांगी
बिना उसकी खोज-ख़बर लिए-दिए?
शहर में कभी-कभी आती है
गांगी के प्रकोप की ख़बर
बाढ़ के कारम, वर्षा के दिनों में
क्या यह ख़बर गांगी की होती है
या उन ज़रूरतों की जो उपजती हैं
गांगी के कारण
गांगी के कारण
क्या सिर्फ़ उपजती हैं समस्याएं?
सोचता हूं
तो गांगी के करार सा
अरराकर ढहने लगता हूं
गांगी ने दिया है..यही
अपने नम करार सा मन
गांगी की ख़बर परासों की तरह
खो गयी है
जो गांव और गांगी के बीच कभी थे
जीते-जागते अद्भुत स्तम्भ
दूर, थोड़े ऊंचे से
पा लेते हैं हम अपना गांव
देखकर परास
उसके गह-गह, टह-टह करते फूल
वहीं परासों के उस ओर है गांव
इस ओर गांगी
दोनों परासों में देख सकता है कोई
क्या गांगी सूख गयी होगी
अब आ गया होगा नहर का पानी
बाढ़... सोचते हैं कुछ अरसा बाद लौटने वाले
या फिर कोई हो तो पूछते हैं एक दूजे से
अंदाजते हुए, लगाते हुए बाजी
संभालते हुए अपने जूते
जूते का उतरना
थकान के धुलने में सहसा शामिल हो जाता है
और क्या-क्या धोती है गांगी
बीरबल लोहार का छोटका बेहतर बता सकता है
सुबह उठते ही वह गांगी से मिलता है
ज़रूरत पर लगा देता है घाट पर अपनी टुटही डोंगी
कई-कई दिनों तक
पड़ी रहती है डोंगी बिन मल्लाह
जो जिस तरफ़ जाता है, लिए जाता है अपने साथ
पालतू कुत्ते की तरह
आज्ञाकारी हो सकती है डोंगी
डोंगी के बदले कितना अनाज़ पाता है बीरबल
साल भर में
यह जानने का कोई उपाय गांगी के पास नहीं
मुश्किल से एक बार
वह गयी थी बीरबल के घर बाढ़ में आधी रात
बीरबल का पुश्तैनी घर ही समूचा
चला आया उसकी अगवानी में सदा के लिए
मिट्टी, छप्पर समेत
बीरबल का घर गांगी में है
इस वह विश्वास के साथ कहता है
मगर गांगी का
इसे कोई नहीं कहता...।
दो तरफ़ से एक वर्तुलाकार नदी से घिरा हुआ
गांगी से
क्यों पड़ है नदी का नाम गांगी
मैं नहीं जानता
और अब, जानने का कोई उपाय नहीं
आजी नहीं रही, इस जिज्ञासा के जगने तक
गांव या पास के जीवित कस्बे मेंहनाजपुर से
कोई नहीं देता गांगी की ख़बर
ज़िन्दा लोगों के लिए
बेमतलब सी क्यों हैं नदियां
हैं भी तो ख़बर लायक क्यों नहीं
कैसे पार लेते हैं लोग गांगी
बिना उसकी खोज-ख़बर लिए-दिए?
शहर में कभी-कभी आती है
गांगी के प्रकोप की ख़बर
बाढ़ के कारम, वर्षा के दिनों में
क्या यह ख़बर गांगी की होती है
या उन ज़रूरतों की जो उपजती हैं
गांगी के कारण
गांगी के कारण
क्या सिर्फ़ उपजती हैं समस्याएं?
सोचता हूं
तो गांगी के करार सा
अरराकर ढहने लगता हूं
गांगी ने दिया है..यही
अपने नम करार सा मन
गांगी की ख़बर परासों की तरह
खो गयी है
जो गांव और गांगी के बीच कभी थे
जीते-जागते अद्भुत स्तम्भ
दूर, थोड़े ऊंचे से
पा लेते हैं हम अपना गांव
देखकर परास
उसके गह-गह, टह-टह करते फूल
वहीं परासों के उस ओर है गांव
इस ओर गांगी
दोनों परासों में देख सकता है कोई
क्या गांगी सूख गयी होगी
अब आ गया होगा नहर का पानी
बाढ़... सोचते हैं कुछ अरसा बाद लौटने वाले
या फिर कोई हो तो पूछते हैं एक दूजे से
अंदाजते हुए, लगाते हुए बाजी
संभालते हुए अपने जूते
जूते का उतरना
थकान के धुलने में सहसा शामिल हो जाता है
और क्या-क्या धोती है गांगी
बीरबल लोहार का छोटका बेहतर बता सकता है
सुबह उठते ही वह गांगी से मिलता है
ज़रूरत पर लगा देता है घाट पर अपनी टुटही डोंगी
कई-कई दिनों तक
पड़ी रहती है डोंगी बिन मल्लाह
जो जिस तरफ़ जाता है, लिए जाता है अपने साथ
पालतू कुत्ते की तरह
आज्ञाकारी हो सकती है डोंगी
डोंगी के बदले कितना अनाज़ पाता है बीरबल
साल भर में
यह जानने का कोई उपाय गांगी के पास नहीं
मुश्किल से एक बार
वह गयी थी बीरबल के घर बाढ़ में आधी रात
बीरबल का पुश्तैनी घर ही समूचा
चला आया उसकी अगवानी में सदा के लिए
मिट्टी, छप्पर समेत
बीरबल का घर गांगी में है
इस वह विश्वास के साथ कहता है
मगर गांगी का
इसे कोई नहीं कहता...।
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Monday, 6 September 2010
बाहर-भीतर चैता
आलू मंडी में पहुंच चुके हैं
कसे जा चुके हैं बोरों में
गेहूं की बालियां खड़ी हैं खेतों में
रात-भर सिवान में सोता है हरवाह
पहरेदारी में
होरहे की गंध फिज़ा में तर है
और सबके चेहरे पर है उत्साह
रामनवमी है और रोहुआं गांव में है चैता
दुबे के दुआरे गांव-जवार से जुट गये हैं चालीस जोड़ी झाल
आख़िर तड़के ही निकले थे लोग
शाम होते-होते तय कर लिया लवंडा भी
जो तिवारी गांव में तमाटर का खेत अगोरता मिला
खुश हैं उसे देख सब
मुछें हैं सफाचट
जुल्फ़ें हैं बड़ी-बड़ी, एकदम चलेगा जी
रात सवा दस बजते-बजते शुरू हो गया
चैता
एक ओर है रोहुआं-तिवारी दूसरी ओर मेघा
पुरास, बहुआरा, बिगहीं, छितौनी
शुरू हुआ चैता
गा रहा है व्यास
व्यास की वक्राकार अंगुलियों पर
चालीस जोड़ी झाल पीटते झूम रहे हैं लोग
लवंडा बीच-बीच में लगा रहा है झटके
ताल की समरसता पर ओंघा रहे हैं सुनने वाले, दूर गांव से आये बूढ़े जवान
कभी-कभी झपकी तोड़ देती है टांसी बूढ़े की
खूब घी पिया है पट्ठे ने
सोचते हैं युवक, ऐसा लगे निकल आयेगा कलेजा टांसी का
एकाएक नींद तोड़ने को व्यास गाता है लटका
आंखे धोते अचानक उठते हैं सुनने वाले
उनकी नींद और सपनों में
बाद के कई महीनों तक पीछा करती है हो रामा की लम्बी तान
जिसे नापने का कोई पैमाना नहीं
कितनी लम्बी गयी तान
क्योंकि व्यास के पास हारमोनियम नहीं था
यह परखने का कोई उपाय नहीं था कि वह कितनी काली गयी उसकी आवाज़
कितना हुई बेसुरा
और इसकी गरज न थी
ठेठ चैता था-जिस पर झूम रहा था
पूरा गांव-जवार
भीतर-बाहर फैला था-चैता।
कसे जा चुके हैं बोरों में
गेहूं की बालियां खड़ी हैं खेतों में
रात-भर सिवान में सोता है हरवाह
पहरेदारी में
होरहे की गंध फिज़ा में तर है
और सबके चेहरे पर है उत्साह
रामनवमी है और रोहुआं गांव में है चैता
दुबे के दुआरे गांव-जवार से जुट गये हैं चालीस जोड़ी झाल
आख़िर तड़के ही निकले थे लोग
शाम होते-होते तय कर लिया लवंडा भी
जो तिवारी गांव में तमाटर का खेत अगोरता मिला
खुश हैं उसे देख सब
मुछें हैं सफाचट
जुल्फ़ें हैं बड़ी-बड़ी, एकदम चलेगा जी
रात सवा दस बजते-बजते शुरू हो गया
चैता
एक ओर है रोहुआं-तिवारी दूसरी ओर मेघा
पुरास, बहुआरा, बिगहीं, छितौनी
शुरू हुआ चैता
गा रहा है व्यास
व्यास की वक्राकार अंगुलियों पर
चालीस जोड़ी झाल पीटते झूम रहे हैं लोग
लवंडा बीच-बीच में लगा रहा है झटके
ताल की समरसता पर ओंघा रहे हैं सुनने वाले, दूर गांव से आये बूढ़े जवान
कभी-कभी झपकी तोड़ देती है टांसी बूढ़े की
खूब घी पिया है पट्ठे ने
सोचते हैं युवक, ऐसा लगे निकल आयेगा कलेजा टांसी का
एकाएक नींद तोड़ने को व्यास गाता है लटका
आंखे धोते अचानक उठते हैं सुनने वाले
उनकी नींद और सपनों में
बाद के कई महीनों तक पीछा करती है हो रामा की लम्बी तान
जिसे नापने का कोई पैमाना नहीं
कितनी लम्बी गयी तान
क्योंकि व्यास के पास हारमोनियम नहीं था
यह परखने का कोई उपाय नहीं था कि वह कितनी काली गयी उसकी आवाज़
कितना हुई बेसुरा
और इसकी गरज न थी
ठेठ चैता था-जिस पर झूम रहा था
पूरा गांव-जवार
भीतर-बाहर फैला था-चैता।
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Friday, 3 September 2010
रिश्ता
किसी भी समय दिख जाता है वह
अलस्सुबह, दोपहर, सांझ या रात में
उसके कंधे पर लदी होती है
कुर्सियां, सिर पर मेज़, हाथ में छोटा स्टूल
पीली मिट्टी पुते फ़र्नीचर
कच्ची लकड़ियों के
आदमी के ऊपर लदा फ़र्नीचर
कोई विस्मय पैदा नहीं करता, किसी में भी
आदमी फ़र्नीचर से लदा होता है
साधारण, बाबू किस्म का आदमी
वह भी जो फ़र्नीचर से लदा होता है
महसूस करता है फ़र्नीचर का बोझ
कैसा अद्भुत तादात्म्य है
लदा होना आदमी और फ़र्नीचर का
एक-दूसरे पर परस्पर एक साथ
फ़िलहाल वह जो बेच रहा है फ़र्नीचर
वह फ़र्नीचर ढो रहा है
फ़क्त वही
वह क्षण भर को सुस्ताने बैठता है
तो रख देता है ज़मीन पर मेज़, कुर्सियां, स्टूल खाली
और बैठ जातै हा उकड़ूं
ज़मीन पर, कहीं छांह देख
कभी-कभी वह ले आता है
लकड़ी की अलगनी
मोहल्ले की औरतें जब करने लगती हैं मोल-भाव
कई बार वह कंधे पर अलगनी लिए-लिए
स्तब्ध खड़ा रह जाता है
मन में कुछ गुनता सा
पसीने से तर-ब-तर
मूर्तिवत्
उस समय लगता है
अलगनी पर कुछ गीले कपड़े लटक रहे हैं
और एक खोया सा मुखौटा
उसकी खूंटी पर टंगा है
कभी-कभी वह हद ही कर देता है
सिर पर पगड़ी रख लदा लेता है
मझोले कद की आलमारी
औरतें-बच्चे हंसते हैं
आलमारी इस तरह बेची जाती देख
वह बाज़ार नहीं जानता
न बाज़ार के नियम
ग्राहक और बाज़ार की परस्पर निर्भरता का अनिवार्य रिश्ता
जो आदमी को कभी-कभी
बाज़ार में छोड़ देता है बिचौलिए की तरह
और कभी-कभी
आदमी को ख़ुद हो जाना पड़ता है
बाज़ार
जब बहुत दिनों तक नहीं बिकते
उसके फ़र्नीचर
गीली-कच्ची लकड़ियों के पीले-फ़र्नीचर
उसका चेहरा पीला पड़ जाता है
फ़र्नीचर के रंग से
एकदम मेल खाने लगता है
और यही नहीं
सूखकर जगह-जगह से
टेढ़े होने लगते हैं फ़र्नीचर
उसका ज़िस्म फ़र्नीचरों के साथ-साथ
बेडौल होने लगता है
झुका-झुका सा।
अलस्सुबह, दोपहर, सांझ या रात में
उसके कंधे पर लदी होती है
कुर्सियां, सिर पर मेज़, हाथ में छोटा स्टूल
पीली मिट्टी पुते फ़र्नीचर
कच्ची लकड़ियों के
आदमी के ऊपर लदा फ़र्नीचर
कोई विस्मय पैदा नहीं करता, किसी में भी
आदमी फ़र्नीचर से लदा होता है
साधारण, बाबू किस्म का आदमी
वह भी जो फ़र्नीचर से लदा होता है
महसूस करता है फ़र्नीचर का बोझ
कैसा अद्भुत तादात्म्य है
लदा होना आदमी और फ़र्नीचर का
एक-दूसरे पर परस्पर एक साथ
फ़िलहाल वह जो बेच रहा है फ़र्नीचर
वह फ़र्नीचर ढो रहा है
फ़क्त वही
वह क्षण भर को सुस्ताने बैठता है
तो रख देता है ज़मीन पर मेज़, कुर्सियां, स्टूल खाली
और बैठ जातै हा उकड़ूं
ज़मीन पर, कहीं छांह देख
कभी-कभी वह ले आता है
लकड़ी की अलगनी
मोहल्ले की औरतें जब करने लगती हैं मोल-भाव
कई बार वह कंधे पर अलगनी लिए-लिए
स्तब्ध खड़ा रह जाता है
मन में कुछ गुनता सा
पसीने से तर-ब-तर
मूर्तिवत्
उस समय लगता है
अलगनी पर कुछ गीले कपड़े लटक रहे हैं
और एक खोया सा मुखौटा
उसकी खूंटी पर टंगा है
कभी-कभी वह हद ही कर देता है
सिर पर पगड़ी रख लदा लेता है
मझोले कद की आलमारी
औरतें-बच्चे हंसते हैं
आलमारी इस तरह बेची जाती देख
वह बाज़ार नहीं जानता
न बाज़ार के नियम
ग्राहक और बाज़ार की परस्पर निर्भरता का अनिवार्य रिश्ता
जो आदमी को कभी-कभी
बाज़ार में छोड़ देता है बिचौलिए की तरह
और कभी-कभी
आदमी को ख़ुद हो जाना पड़ता है
बाज़ार
जब बहुत दिनों तक नहीं बिकते
उसके फ़र्नीचर
गीली-कच्ची लकड़ियों के पीले-फ़र्नीचर
उसका चेहरा पीला पड़ जाता है
फ़र्नीचर के रंग से
एकदम मेल खाने लगता है
और यही नहीं
सूखकर जगह-जगह से
टेढ़े होने लगते हैं फ़र्नीचर
उसका ज़िस्म फ़र्नीचरों के साथ-साथ
बेडौल होने लगता है
झुका-झुका सा।
Wednesday, 1 September 2010
उम्र
अर्जित की जाती है
कंजूस बनिए सी
ख़र्च
सूद में से
टूट जाती है
आईने की तरह अचानक कच्च से
फूलहा परातों सी होती है उम्र
रखे-रखे ही
पड़ जाती है फ़ीकी जिसकी कलई
भीख सी बंट जाती है
इस-उस कटोरे में
आशीर्वाद की तरह
बिछी रह जाती है कई बार
किसी के लिए प्रार्थना मुद्रा में।
कंजूस बनिए सी
ख़र्च
सूद में से
टूट जाती है
आईने की तरह अचानक कच्च से
फूलहा परातों सी होती है उम्र
रखे-रखे ही
पड़ जाती है फ़ीकी जिसकी कलई
भीख सी बंट जाती है
इस-उस कटोरे में
आशीर्वाद की तरह
बिछी रह जाती है कई बार
किसी के लिए प्रार्थना मुद्रा में।
Sunday, 29 August 2010
ख़्वाब देखे कोई और
मेरे साथ ही ख़त्म नहीं हो जायेगा
सबका संसार
मेरी यात्राओं से ख़त्म नहीं हो जाना है
सबका सफ़र
अगर अधूरी है मेरी कामनाएं
तो हो सकता है तुममें हो जायें पूरी
मेरी अधबनी इमारतों पर
कम से कम परिन्दे लगा लेंगे घोंसले
मैं
अपने आधू-अधूरेपन से आश्वस्त हूं
कितना सुखद अजूबा हो
कि
मैं अपनी नींद सोऊं
उसमें ख़्वाब देखे कोई और
कोई तीसरा उठे नींद की ख़ुमारी तोड़ता
ख़्वाबों को याद करने की कोशिश करता।
सबका संसार
मेरी यात्राओं से ख़त्म नहीं हो जाना है
सबका सफ़र
अगर अधूरी है मेरी कामनाएं
तो हो सकता है तुममें हो जायें पूरी
मेरी अधबनी इमारतों पर
कम से कम परिन्दे लगा लेंगे घोंसले
मैं
अपने आधू-अधूरेपन से आश्वस्त हूं
कितना सुखद अजूबा हो
कि
मैं अपनी नींद सोऊं
उसमें ख़्वाब देखे कोई और
कोई तीसरा उठे नींद की ख़ुमारी तोड़ता
ख़्वाबों को याद करने की कोशिश करता।
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Wednesday, 25 August 2010
हूक
एक हूक
गांव से काम की तलाश में आये
भाई को टालकर विदा करते उठती है परदेस में
एक हूक
जो बूढ़े पिता की
ज़िम्मेदारियों से आंख चुराते हुए उठती है
मां की बीमारी की सोच
उठती है रह-रह
बहन की शादी में
छुट्टी नहीं मिलने का बहाना कर
नहीं पहुंचने पर
मैं उस हूक को
कलेजे से निकाल
बेतहाशा चूमना चाहता हूं
मैं प्रणाम करना चाहता हूं
कि उसने ही मुझे ज़िन्दा रखा है
मैं चाहता हूं कि वह ज़िन्दा रहे
मेरी आख़िरी सांस के बाद भी
मैं आंख के कोरों में
बेहद सम्भाल कर रखना चाहता हूं
कि वह चुए नहीं
हूक ज़रूरी है
सेहत के लिए
हूक है कि
भरोसा है अभी भी अपने होने पर
हूक एक गर्म अंवाती बोरसी है
सम्बंधों की शीतलहरी में।
गांव से काम की तलाश में आये
भाई को टालकर विदा करते उठती है परदेस में
एक हूक
जो बूढ़े पिता की
ज़िम्मेदारियों से आंख चुराते हुए उठती है
मां की बीमारी की सोच
उठती है रह-रह
बहन की शादी में
छुट्टी नहीं मिलने का बहाना कर
नहीं पहुंचने पर
मैं उस हूक को
कलेजे से निकाल
बेतहाशा चूमना चाहता हूं
मैं प्रणाम करना चाहता हूं
कि उसने ही मुझे ज़िन्दा रखा है
मैं चाहता हूं कि वह ज़िन्दा रहे
मेरी आख़िरी सांस के बाद भी
मैं आंख के कोरों में
बेहद सम्भाल कर रखना चाहता हूं
कि वह चुए नहीं
हूक ज़रूरी है
सेहत के लिए
हूक है कि
भरोसा है अभी भी अपने होने पर
हूक एक गर्म अंवाती बोरसी है
सम्बंधों की शीतलहरी में।
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