Saturday, 21 February 2015

आक्रमणकारी होती हैं इच्छाएं

कविता

अभिज्ञात

पीपल की नयी ललछौंही पत्ती की तरह
उगी हुई इच्छा
हममें सेंत में व्यक्त नहीं हुई
पहले दुलारा हमने
छुआ हौले से उसने
नाराज़गी ज़ाहिर हुई
चुप क्यों हैं परस्पर

कुछ दिन नेंपी रह सकती तो भी क्या बनता

आक्रमणकारी होती हैं इच्छाएं हमारी लाचारी पर
होती हैं इसलिए बहुवचन

बहुवचन के बाहर जो कुछ भी है
वह व्याकरण द्वारा बुना गया झूठ है
ऐसा माना नहीं
जाना जाता है

देह की मेढ़ रीढ़ की मेढ़ पर
उगती आयी हैं इच्छाओं की फसलें
मेढ़ हद है
कि हद है
और हद है कि तोड़ती रही हैं उसे इच्छाएं
उस पर जमीं हुई

हवा के झोंकों के साथ
बदल देती हैं इच्छाओं की टहनियां, शाखाएं अपना रुख

झड़ती रहती हैं पत्तियां जिस तिस ओर
पीली..हरी।

बिया

कविता

अभिज्ञात

रेण का काला भूरा कत्थई ललछौंहा बिया
मुझसे कुछ कहता है
जिसके बयान से परिचित हैं
मुझसे अधिक
मासूम बच्चे
बहुत अधिक परिचित हैं उनकी हथेलियां
तीन बिया फोड़ने के बाद
अजेय सा होता बिया
बच्चों की लड़खड़ाती अकड़ में
शामिल हो जाता है


यह अद्भुत है
सबसे छोटा बिया फोड़ देता है
बड़े का पेट
और यह एक संगीन सच है
जिसे बच्चे नही जानते
कि संगीन कितना है।

मोहित

कविता

अभिज्ञात

खुश है
पूरी एक कतारबद्ध पीढ़ी
कि बोलियां लग रही हैं
जहां-तहां
न सिर्फ़ चौमुहानों पर
बल्कि बंद कमरों, चायखानों तक में

बोली से अघाते हुए
यह सोचने की बात है
कि बोली
समकालीन भाषा से कट रही है
जबकि सुधिजन अपने उच्चारण पर मोहित रहे।




धूप हमारी आंखों पर खड़ी है

कविता

अभिज्ञात

मुश्किल तो ये है कि धूप
अपने पांवों पर नहीं
हमारी आंखों पर खड़ी है
हम मूंद लेते हैं आंख
और वह धम्म देना एक तलहटी में गिर जाती है
अपने ओर-छोर के साथ

यह विस्मय है कि फिर भी
वह छू लेती हैं अपनी बारीक नहों से
और धकिया देती है हमारी अपनी तैयारी की ओर

हमारी अपनी तैयारी की केन्द्र
मोतियाबिन्द है
मोतियाबिन्द के बाद
धूप भरे मौसम में देखना
एक सम्मोहन में जीना है।

यह अ-तय दिन

कविता

अभिज्ञात

यह दिन भी तय हो गया
और अ-तय दिनों की तरह
इस दिन भी अप्रासंगिक
स्वप्न संभावना

पढ़ी गयीं बस एक दिन
चिट्ठियां जब-तब की आयीं

बिल्ली काटेगी के भय से सोयी रही बिटिया
स्पप्न में मांगती रही चाक
इस इकहरी निद्रा स्थिति को
स्वयं जिया हमने इस पूरे दिन
न आयी बिल्ली न मिला चाक
हममें से किसी को

एक खौफ़ की अंधी गुफा मे दुबके खरगोश सा हमारा अस्तित्व
एक ऊंची मंचान पर चढ़ा अगोर रहा है
जबकि यह मौसम नहीं है फसल का
सिवानों में बची हैं खुत्थियां तिरछी, खड़ी
कटी फसलों की
यह ताज़ा होरहे की गंध है
जो ख़यालों से छनकर आती है
पश्ती के गझ्झिन दिनों में

यह शनिवार को कटे नाखूनों का प्रकोप है
कहती है पत्नी
बिना यह जाने कि पूरी दुनिया नाखून की नियति की ओर अग्रसर है।

बहुवचन व्याकरण में नहीं

कविता

अभिज्ञात

बेचारगी है कि हर जगह खुली है दिशाएं
आज़माइश को
बेचारगी भी यही है
सभी दिशाएं किसी बंद गली का नाम हैं
ऐसों के लिए

रास्ता बस खुलने-खुलने को लगे
और बस लगे..लगे
मिले नहीं कोई सिम् सिम् का मंत्र

अन्ततः ढूंढा भी नहीं

दिशाए
नहीं, नहीं, नहीं चाहिए किसी को भी
आज के दौर में
बहुवचन व्याकरण में नहीं।

ज़िद

कविता

अभिज्ञात

ज़िद वही तो होती है जिसे हम
तैयार करते हैं अपने ही विरुद्ध
अपने-आपमें, अपने ही लिये

ज़िद कैसी वह ज़िद
जो न हारे प्रेम के आगे
ज़िद वह कैसी जो
जीतने को बनी हो

ज़िद आख़िरकार हमारे ही भीतर
हमारी ही तो बनायी है
ज़िद ने कब हमें ढालना शुरू कर दिया
अपने तौर।

बेचैन

कविता

अभिज्ञात

लौट पड़ने की मनाही नहीं है
हज़ारों हज़ार समझौतों से आक्रांत हो
हालांकि अपनी हर हत्या के बाद
वे अधिक चमकदार, ताज़ातरीन और बेहतर मिले
पुख़्ता किस्म की तरस भी जन्मने लगी
उन्होंने हत्या को महिमा मंडित कभी नहीं किया
वह गोपनीय और गोपनीय विधा थी उनके लिए
नये हत्यारों की अगवानी में
वे उत्सुक रहे और बेचैन

वे उनमें से हुए
जिन्होंने हत्या के बाद भी भरीपूरी ज़िन्दगी जी
और हत्याओं के ख़िलाफ़
इस बहुत सारी उम्र में
शाब्दिक तौर पर लड़ते रहे।

बंद दरवाज़े के भीतर

कविता

अभिज्ञात

उदारता और सम्पन्नता के पावन क्षणों में
हमारे पैर जो बहुत-बहुत काम आते हैं
उनके लिए
कामचलाऊ जूता ख़रीदने के बाद
हमारी ज़ेब बहुत दिनों तक खिसियायी रहती है
जिसमें एक कराह शामिल है


विकल्पहीनता की इस सकारात्मक साझेदारी में
हम अपने-आपको
कहीं न कहीं शामिल पाते हैं
और हमारा यह शामिल होना
बहुत सारे दरवाज़े बन्द करता है
जिसकी भीतर
कुछ लोग
सही-सलामत और बेखौफ़ रहते हैं।

विडम्बना

कविता

अभिज्ञात

उन्होंने सोचा
वहा यह भी खूब रही
उन्हें पता नहीं चला कि
वह कलाकृति उल्टी थी
वस्तुतः हो जाना चाहिए सावधान
कि उन्हें पता नहीं चल सका
कलाकृति उल्टी थी।

एकरूपता

कविता 

अभिज्ञात

अस्तित्व तो सबका ही मोम होता है
और अब
उसकी अनिवार्य नियति है
उसमें सभ्यता की गर्म सलाखे

जो एक सांचा भोंक जाती है
और मित्रो
निर्माण की जन्म कुण्डली
यहीं
और इसी प्रकार ईज़ाद होती है

सभ्यता द्वारा रची गयी
कुण्डलियां इतनी भयावह होती हैं
कि आदमी उसमें
एक सांप
और कभी-कभी
केंचुए की मानिन्द
कुण्डली मार कर दुबक जाता है
भय की एकरूपता
चरित्र की एकरूपता बनती चली जाती है।

साझेदारी का न्योता

कविता

अभिज्ञात

सबसे पहले अपनी बात
मैंने धूल से कही
क्योंकि धूल से अंत में हुई बात
धूल होती है

धूल से पहले पहल मिलना
कम से कम शहर में
निहायत ज़रूरी है
और ख़तरनाक़
क्योंकि
वह तुम्हारे परिचय पर
बड़ी आत्मीयता के साथ
छाई होती है
और समय के साथ-साथ
पक कर झर जाती है
तुम्हारी ज़मीन के पकने से पहले
बशर्ते वह ठोस और पुख़्ता हो

धूल का पहला रिश्ता
आंखों से बनता है
और आंख
हर रिश्ते के लिए ज़िम्मेदारी होती है
क्योंकि आंख के पास
खुले रहने की बेचैनी होती है
और सार्थकता

आंख की इस अनवरत यात्रा में
धूल का रिश्ता प्राथमिक स्तर पर
आमंत्रण और पड़ाव का होता है

इसलिए धूल से कहता हूं
अपनी बात
कि
वह ख़ुद ब ख़ुद पहुंचा देगी
मेरा संदेश
बेचैन आंखों तक
कि मेरी ज़मीन का न्योता है
अनन्त साझेदारी का।

जिसके लिए ढली है भाषा

कविता

अभिज्ञात

इससे पहले कि बाहर चांद
और घर की मोमबत्ती का प्रकाश
पिघल कर रीत जाये
तुम मेरी अंजुरी में धर दो एक बात
बात, जो टांकी जानी है
अबकी सावन में झलुआ पर पटेंग मारती कजरी में
बात, जो गूंथी जानी है आटे के साथ चौके में
रगड़ी जायेगी तुलसी के पत्ते
और पी जायेगी सतनारायण की कथा के चरणामृत के साथ

बात, जो मेरे कान के लिए ही बनी है
जिसके लिए ही बने हैं तुम्हारे होंठ
ढली है भाषा

धर दो अंजुरी में
वही सांवली झबरीली बात
कनखियों से ताकती बात
होठों में सिमटी बात।

शुक्रवार के बग़ैर जीते हुए

कविता

अभिज्ञात

सीढ़ियों पर मिल गया मुझे
सहसा शुक्रवार
लोगों को हैरत थी
ऐसे भला मिलता है किसी को
एक दिन
समूची अर्थवत्ता के साथ

मगर वह था हैरत को मुंह चिढ़ाते हुए

मंगल से नापो तो बीचोंबीच खड़ा हफ़्ते के
प्रस्थान से नापो तो मंज़िल के
जन्म से मृत्यु के बीच
एक अदद शुक्रवार
अर्थात मेरी पृथ्वी, शहर और जीवन के बीचोंबीच
जहां से हर ओर हो सकती है अनन्त यात्राएं
जहां आकर हो सकती हैं ख़त्म

मेरी दिनचर्या को एक अजीब सम्मोहन से संचालित करता
मेरा आकांक्षा, मेरी पराजय के बीच एक सांत्वना
और धैर्य शुक्रवार
अचानक उस समय मिला
जब मैं हिकारत से देखता हुआ लिफ्ट को
मुड़ गया था सीढ़ियों की ओर

सीढ़ियों पर मिल जाते हैं जैसे
भिखारी के कटोरे में सिक्के
क्या इसी तरह मिला था मुझे
मैंने मन में टटोला
उस समय जब कड़कती ठंड में
मुझे एक गर्म कंबल की ज़रूरत थी घर
और सड़क पर हाथ
एक दिन मुझे पता चला
सीढ़ियों पर मिलने वाले भी
फिसल जाते हैं हाथ से
कट जाते हैं ज़ेब से
लूट लिए जाते हैं तिज़ोरी से
और यह भी कि
बदल दिये जाते है कुछ टटकी
टहटह सुविधाओं से
सिक्के और शुक्रवार।

तुम्हें फ़ुरसत नहीं

कविता

अभिज्ञात

मैं एक मेज़ हूं
जिस पर अपन केहुंनी गड़ाकर
तुम धरती हो
अपने गालों पर हाथ
और सोचती हो
गुज़रे कल के बारे में

एक अंधेरा हूं
जिसके सामने
आंखे खुली रखने का
कोई औचित्य नहीं
न ही उसे निहारने का
और ना ही
उसके बारे में सोचने का
अंधेरा सुविधा है
अतीत की ओर बहने का

एक कमरा
जो तुम्हारा नितांत वैयक्तिक
उसमें
दूसरों की उपस्थिति
तुम्हें खलती है
और ख़ुद आने की
फ़ुरसत नहीं है

एक नाइट लैंप
जो गयी रात तक जलता है
तुम्हारे सिरहाने
जिसके मंद प्रकाश में
तुम देखती हो
एक टूटा मोरपंख, पुराने अलबम
पढ़ती हो
पीली पड़ गयी चिट्ठियां
एक लिहाफ़ जिसमें समाना
सिर्फ़ तुम्हारी सुविधा है

एक खिड़की
जिसमें से तुम झांकती हो
एक टूटे इंद्रधनुष की ओर
तुम्हारे कलेंडर की एक तारीख़
जिस पर
किसी विशेष आशय से
चिह्न लगाकर तुम भूल गयीं
कि क्यों लगाया था

मैं
एक बात
जो तुम्हें ग़लत मौके पर सूझी

एक ख़त
जिसे पढ़कर तुमने
उसी पते पर लौटा दिया
जहां से चला था।

नींद पर सेंध

कविता

अभिज्ञात

चटकल मज़दूर डरते हैं जादू से

जादू से ग़ायब हो सकती हैं
रातोंरात
मिल में उनके काम करने का हरेक प्रमाण

उनका हिसाब गायब हो सकता है
सिरे से

उन्हें यह भी चाहिए आश्वासन
कि अगर ऐसा हो
तो हो केवल जादू

सुनते हैं, जादू है महज आंख का धोखा
जस-का-तस हो जाता है सब बाद में

चटकल मज़दूर
खूब खूब पहचानते हैं अख़बारनवीसों को
बार-बार आते हैं वे
उनकी खोज खबर को आख़िरकार
वे नहीं सोचते
ऐसा क्या है जिससे
खिंचे चले आते हैं अख़बारनवीस
क्यों हो जाते हैं वे अख़बारों की चीज़


चटकल मज़दूर
हमेशा एक पैर उठाये खड़े रहते हैं भगीरथ की तरह
देस लौटने की तैयारी में

क्या लाने जाते हैं वे सचमुच
महज ठोंकुआ, सतुआ, अचार और भुजना?

हड़ताल और तालाबंदी की ख़बर पा
कहां चले जाते हैं
चटकल के भोजपुरिया मज़दूर कलकत्ता छोड़
दूसरे कहते हैं उन्हें गद्दार
कि उन्हीं के कारण हारते हैं यहां बच जाने वाले
वे नहीं जानते
उन्हीं भगोड़ों के कारण चलती रहती है चुपचाप
राजनीति की दुकानें

लम्बे सोने के सूत हैं या सपने
जिन्हें अपनी नींद तक में कातते हैं चटकल मज़दूर
मिल की ऊंची चिमनियां हैं
जो उनके फेफड़ों के लिए
उगल रही हैं आक्सीजन
वे कौन हैं जो उनकी नींद और आक्सीजन पर लगा रहे हैं सेंध?

ताज़ा राब

कविता

अभिज्ञात

वे अपने कुंडे में
सहेजकर ता देते हैं राब
और निकल पड़ते हैं
उसकी संगत के लिए
जोन्हरी की करारी लिट्टी की तलाश में

इससे पहले कि वे
पहुंच पाये लिट्टी तक
उनकी कत्थई ताज़ा राब
जमकर
बदल चुकी होती है
सफ़ेद, पीली मोरस की चिन्नी में

हैरत है यह सब
गांव में
सदियों से चल रहा है।

जतसार

कविता

अभिज्ञात

जब तक रहती है घर में
सबको ताज़ा खिलाकर
खाती है मां बासी खाना चोरी-चोरी
अन्न फेंका नहीं जाता

नहीं होते उपेक्षित
पुराने कपड़े

धुंधली दृष्टि के बावज़ूद
सहेजकर धरी रहती है सुई
अचार में नहीं लगती है भुअरी

मां
त्योहारों की शृंखला है
मौसम का ब्यौरा
हक़ीम
जांते का गीत

मां का सबसे प्रिय प्राणी है
छछुन्नर
सबसे प्रिय बिछखोपड़ा
क्योंकि वह रंग बदलता है

रंग उतरने की शिकायत
उसे कपड़ों से सबसे अधिक रही है
मां खुद एक रंग है
जो न बदलता है न उतरता है

मां
सबसे पहले जगती है
और सोती है
सबसे अखीर में
जिस पर ध्यान किसी का नहीं जाता

मां एक गणित है
जिसमें सवाल के बाहर के हिसाब हैं।

प्रेम हर कहीं है, कहां-कहां खोजूं

कविता 

अभिज्ञात

मैंने पहले सोचा
प्रेम मुट्ठियों में है
मुझे संतोष नहीं हुआ
मैंने पीछा किया
मुट्ठी में नहीं मिला
फिर मैंने सोचा
हाथ की लकीरों में होगा कहीं
ज्योतिषियों को दिखाया
हाथ की लकीरों के बारे में पढा
लेकिन नहीं था उसमें

मुझे लगा
हड्डियों में होगा कहीं छिपा
श्मशान तक पीछा किया
कि जलेगी उसकी काया
और मिले जायेगा मुझे
प्रेम
लेकिन नहीं मिला
तो राख में होगा कहीं
अब मुश्किल यह है
बिखर गया राख बन जगह-जगह
अब तो संभावना यह है
प्रेम हर कहीं है
कहां-कहां खोजूं
अफसोस
क्योंकर पीछा किया उसका।

हम क्यों नहीं हुए चाहते हुए भी एक

कविता 

अभिज्ञात

फिर मैं पता नहीं लौटूं कि नहीं, तुम्हें पाने को
फिर तुम हो कि न हो प्यासी

लौटा भी दिया अनचाहे तुमने
लौट भी आया मैं
अविश्वास भरा- कि लौटा जा रहा हूं

तुम लौटाते हुए किस तरह हारी हो
और मैं लौटाते हुए तुम्हारे हारने को ही
महसूस करता...
अपनी तो खैर ख़बर ना ही पूछें।

बहुत दिनों बाद तुम वहीं नहीं हो, हालांकि कोशिश वहीं दिखने की कोशिश करती हुई
मैं भी ढांपने में लगा हूं
तुम्हारे पुराने दिखते रहने की खामियां

अफसोस कौन जताये
हम क्यों नहीं हुए चाहते हुए भी एक।

विस्मय का मर जाना

कविता
अभिज्ञात

जिनसे मेरा
सम्पर्क है दीर्घ-दिनी
उनसे मैं रहना चाहता हूं दूर
मिलूं भी तो अन्तराल में

मैं मिलना चाहता हूं उनसे
जो मुझसे गहरे तक जुड़ें
और हो जायें फिर पूर्ववत्

हर अपरिचित के साथ
शुरू में महसूस की जा सकती है
उसके अनुभव की जीवंत आंच
जिससे जुड़ने वाला भी गुज़रता है
धीरे-धीरे हो जाता है इतना परिचित
कि अपना सा लगे

विस्मय का मर जाना
नये आंच की खुशबू का चुक जाना
एक हादसा है

मुझे अपनी यात्राओं के लिए चाहिए
नयी राहें
नये आदमी
नये आत्मीय
जो आयें
पर तब तक के लिए ही
जब तक
नयी आंच से तपायें।

यह अपराध हम करते हैं

कविता

अभिज्ञात


यह अपराध हम करते हैं

कभी-कभी
चूम लेते हैं नींद में सोये बच्चे की
इससे भाग जाते हैं फ़रिश्ते

यह अपराध हम करते हैं
कभी-कभी
चूम लेते हैं सोये बच्चे को
ख़ुद हो फ़रिश्ता

यह अपराध हम करते हैं।

तुम्हें निकालते ही दिन

कविता 

अभिज्ञात

तुम्हें निकालते ही
दिन एक खाली झोले में तब्दील हो जाता है
जिसे न हाथ में धरते बनता है
न कंधे पर लटकाते
उकताकर टटोलता हूं
कोई लम्बी और अंधेरी जेब
और उसमें ठूंस देता हूं
पूरा का पूरा रहियाकर

ऐसा नहीं कर पाया
तो छोड़ आता हूं भूल से
काफ़ी हाउस की किसी मेज़ पर
हुगली के तीर पर
या कहीं और

और इसमें कोई हैरत नहीं
खाली चीज़ें
कभी भी
और कहीं भी छूट जाती हैं।

और मिल गया मुझे रास्ता

कविता

अभिज्ञात

हमारे जाने से ठीक पहले
जाती है सांस
पर वहां नहीं
जहां हम जाते हैं

अरसे तक साथ रहने के बाद
ऐसा क्यों
भला क्यों होता है कि वह
चली जाती है बड़ी निठुराई से
किसी और..और दिशा की ओर
क्या ऐसी कोई जुगत है
जहां रह सकती है मेरी सांस
हमेशा हमेशा के लिए बरकरार
मेरे वज़ूद के साथ
सहसा
तुम दिखी
और मिल गया मुझे रास्ता।

Friday, 20 February 2015

भूख भर की दूरी

कविता

अभिज्ञात


वह शिलाएं
तोड़ता रहा उम्र भर
बनाते रहने के उपक्रम में
मूर्तियां

इस तलाश में
वह खुद भी धीरे-धीरे
छेनियों से भी आहिस्ता
टूटता गया
जहां-तहां बनता हुआ

कहते रहे कुछ लोग उसे
कारीगर
कुछ उससे कम लोग
कलाकार

कारीगर और कलाकार के बीच
थी
भूख भर की दूरी।

चिन्ता में एक साथ

कविता 

अभिज्ञात


और अच्छा हो
दुनिया में मनाया जाये
धूम्रपान दिवस

पूरी दुनिया के तम्बाकू
आमने-सामने हों
सबके सीने, उसमें चलती हुई सांसे, खदबदाती हुईं
और सबके ललाट, पैर, हाथ और कंधे

कितना अद्भुत होगा
समूची दुनिया का
एक ही लत से होना साबका
होना, एक ही फ़िक्र तम्बाकू की


कितना कम है दुनिया में तम्बाकू
कितनी ज़रूरी है
और ज़रूरत की तुलना में कितनी कम
कैसे चलती आयी है दुनिया
इतनी कम तम्बाकू से
आदमी की और ज़रूरतों की तरह

हालांकि
तम्बाकू का अधिक होना
अपने अस्तित्व के लिए
संकट मोल लेना है
और तम्बाकू का अभाव
आदमी की बेचैनी को
उसकी अंतिम हद तक ले जा सकता है

कितना अच्छा है
एक ही मुद्दे पर बतियाना
और एक बड़ी चिन्ता में एक साथ
पूरी दुनिया का शरीक होना।

जब पत्थर एक व्यवस्था हो

कविता

अभिज्ञात


पत्थर संवाद की स्थिति से गुज़र रहे हैं
या
प्रतिध्वनि की
मौन का एक उत्सुक उत्सव
एक नतीजे तक पहुंचा देगा

लेकिन सावधान
कि नतीजे पर पहुंची हुई कोई भी चीज़
पत्थर होने से न बचेगी

पत्थर को एक नतीजे पर लाना
और
फिर नतीजतन पथराना
मौन की अवहेलना के लिए
राजी होना है

तो क्या है और कोई स्थिति
पत्थर की अंतःक्रिया से चुपचाप जुड़ने की
ख़ास तौर पर उस समय तो और भी
जब पत्थर एक व्यवस्था हो
प्रति-व्यवस्था भी

पत्थर के विरुद्ध पत्थर
आग की संभावना है या धमाके की
और इन दोनों के बग़ैर
किसी को चाहिए पत्थर के ख़िलाफ कुछ तो?

नहीं उठ रहा है पत्थर के अर्थ को
नकारने का कोई अर्थ

और सहसा लगा कि
हो सकता है आख़िरी बार सोच रहा होऊं इस पर
मैंने ठाना
पत्थर पर लिख देना चाहिए ठीक से-पत्थर
अपनी भाषा-सामर्थ्य और व्याकरण के साथ
और इस प्रकार हुआ जा सकता है
किसी हद तक आश्वस्त
कि भले मिट जाये शब्द
मगर वहां कुछ तो लिखेगी बरसात
धूप
चांदनी
ओस
पत्थर की अर्थ-तह के बरअक्स।।

आक्रमणकारी होती हैं इच्छाएं

कविता

अभिज्ञात


पीपल की नयी ललछौंही पत्ती की तरह
उगी हुई इच्छा
हममें सेंत में व्यक्त नहीं हुई
पहले दुलारा हमने
छुआ हौले से उसने
नाराज़गी ज़ाहिर हुई
चुप क्यों हैं परस्पर

कुछ दिन नेंपी रह सकती तो भी क्या बनता

आक्रमणकारी होती हैं इच्छाएं हमारी लाचारी पर
होती हैं इसलिए बहुवचन

बहुवचन के बाहर जो कुछ भी है
वह व्याकरण द्वारा बुना गया झूठ है
ऐसा माना नहीं
जाना जाता है

देह की मेढ़ रीढ़ की मेढ़ पर
उगती आयी हैं इच्छाओं की फसलें
मेढ़ हद है
कि हद है
और हद है कि तोड़ती रही हैं उसे इच्छाएं
उस पर जमीं हुई

हवा के झोंकों के साथ
बदल देती हैं इच्छाओं की टहनियां, शाखाएं अपना रुख

झड़ती रहती हैं पत्तियां जिस तिस ओर
पीली..हरी।

नमी

कविता

अभिज्ञात


न जाने कब
किसी घर का लटकता फैन
गोरखपाण्डे की लाश के साथ
उपस्थित हो जाये
कब किसकी मौत
बदल जाये आत्महत्या में
कहना मुश्किल है

दिल्ली अब भी
हो सकती है विचारवान
वहां विचारों की कमी नहीं
विचारों की नमी है
धूप के बगैर

ये नमी सीलन में बदल सकती है
घुस सकती है लालकिले और संसद में

घुस सकती है
तुम्हारी एड़ियों में
एडि़यों की बिवाइयों में भर सकती है मवाद।
दिल्लीवालो सावधान!!

चुम्मा दो

कविता

अभिज्ञात

मेरी प्यारी बेटी चुम्मा दो

चुम्मा दो कि
ज़िन्दगी पुरुवा हवा की तरह बहे
वहां, जहां दर्द पुराने पिराने लगें

पुरुआ इतिहास से
जोड़ती है
जोड़ती है जड़ों तक
जड़ों के उन्माद से
सच तो ये है कि पुरुआ
जोड़ती है इतिहास के उन्माद से

मैं उन्माद की मियाद के
बिखेर दूं तिनके-तिनके

चुम्मा दो कि
एक बाबर्ची संस्कृति के तहत
मूल्यों को स्वाद में
बदल डालने की प्रक्रिया सहज न होने दूं
जो लार संचालित है

चुम्माद दो कि अक्रिया की धौंस देती
जुगाली करती भंगिमाएं
आक्रांत न कर सकें

चुम्मा दो बेटी
अपने दूध गंधी होठों से
कि मेरी कोशिशें कारगर हों
हज़ार हज़ार मांओं और गायों के थन से
उतर आये दूध
तमाम दुनिया के लिए

चुम्मा दो कि मैं
अपनी सारी थकन भूल जाऊं
गढ़ लाऊं अनूठी गगरी
जिसमें तुम भर पाओ
आस के
हास के सारे सपन।

पटरियां

कविता

अभिज्ञात

रेलगाड़ियों, पब्लिक टेलीफ़ोन बुथों और
सार्वजनिक शौचालयों की दीवारों पर
लिखे मिलेंगे
गोपन इश्तहार अजीबो गरीब
लगते
अश्लील

एक घुप्प अंधेरा कराहता है
लंगड़ाता हुआ
आदमी और भाषा के बीच

किस काम की हैं उस अनुगूंज से बची हुई अभिव्यक्तियां
तुर्रा ये कि
कविताएं चाहती हैं पटरियां।

कम हूं मैं

कविता

अभिज्ञात

बाकी गोलार्ध कहीं होगा

थोड़ा सा
मुझसे बचा हुआ

बची हुई है जैसे
सांस
प्रेम
कविता
और तुम
मेरे अन्दर के बावजूद

है कठिनतर
अपने से बाहर का कत्तई स्वीकार

उस बाहर के अन्दर
कितना कम हूं मैं
हूं भी या नहीं उसके अन्दर
इसीलिए
शायद इसीलिए।

रचो स्वरलिपि

कविता

अभिज्ञात


मैं अचीन्हा हूं
तुम्हारी लटों से
कि जूड़े खोलो

अपरिचित हूं तुम्हारी सांसों से
कि
आओ और करीब

तुम्हारा स्पंदन अजाना है
कि झंकारो मुझे छू
कि रंगो को पहचानने दो
खुली रहने दो अपनी आंखें कुछ पल और


मैं अकेलेपन की दर्प में डूबा हूं
मुझे तोड़ो, साझेदार बना

मैं चाहता हूं
पर याचक नहीं हूं
मैं एक गान हूं
जिसकी रचो तुम स्वरलिपि

मैं समयबद्ध हूं
कि समयातीत कर दो

मैं निर्दिष्ट हूं
कर दो दिशाहीन

मेरे जीवन में आओ और चल दो
फिर मैं सहेजा करूं
पशोपेश में अपने-आपको।

जानकारी

कविता

अभिज्ञात

कितना कम जानता हूं
मधुमक्खियों के बारे में
जब मैं कह रहा होता हूं
तुम्हारी बातों को शहद
                        
कितना कम जानता हूं
सुख के बारे में
जब मैं कर रहा होता हूं
प्रेम

फल लदे पेड़ों पर ढेला चलाते हुए
एक ठूंट ही तो होता होऊंगा।

घर हूं

कविता

अभिज्ञात

आजकल
वे घर में है

आजकल
मैं घर हूं।

Thursday, 19 February 2015

पहाड़ प्रतीक्षा का कैसे दिखाऊंगा...

कविता

अभिज्ञात

यह दातूनों की मांज से चमके हुए दांत की सुबह
चाय की प्रतीक्षा में रुकी हुई तमाम हलचलों के बावज़ूद
है

यह खाली गगरियों को भरने की बेला
कंबल के रूखेपन को
अपनी त्वचा पर महसूसने का अंतिम क्षण

किसी बच्ची के नन्हे हाथ की थपकी के चमत्कार से भरी हुई सुबह
क्या सचमुच ठहर पायेगी

मेरी अनगिनत सुबहों के तमाम स्थगित वर्षों की थानों को
तुम जिस संदूकची में बंद करती गयी हो
उसे चाट न जायें दीमक
फिर...पहाड़ प्रतीक्षा का कैसे दिखाऊंगा?

फिर भी बची है

कविता

अभिज्ञात

आधी-अधूरी सी
सुबह बची थी
उस दरख़्त पर
आधी-अधूरी हरितिमा के रूप में

एक अधूरी सी ज़िन्दगी थी
ख़त्म है अपने अधूरेपन की उच्चता पर

यह खाली गगरियों की एक खनक थी

संदूकची की सीलन भरी गंध

कंबलों का रूखापन त्वचा पर

नाक के बढे हुए बालों के विरुद्ध
सावधानी व नज़ाकत से हुआ
कैंची का बरताव

संखे की चूड़ियों का शगुन

बहराई हुई चुप्पी
चींटियों की ढोआई
फिर भी बची है।


वध से बचाव

कविता
अभिज्ञात
संवाद संकट की स्थति में हैं
मैं भयभीत हूं
कहीं मेरी बातचीत में
मेरी विवशताएं रिरियाहट में तो नहीं तब्दील हो गयी हैं

और घृणा
क्रोध में

मैं हर परिचित से
डरने लगा हूं
कि हो सकते हैं
ये केवल भेदिये

एक अनुकम्पा भरी ईश्वरीय मुस्कुराहट उभरते कितनी देर लगती है
संकट बेला में
परिचितों के चेहरे पर

अपने-आपको वध से बचाने की एक कोशिश है
नितांत अकेला होना।

अब मैं कहूंगा

कविता

अभिज्ञात

अरअस्ल
अब मैं कहूंगा अपने को-अलगनी
उन्होंने टांग दिये थे मुझे पर
अपने विचार

वैसे कुछ और समझने के लिए स्वतंत्र था
अपने-आपको
जैसे कि पेड़
लेकिन पेड़ में अपना भी भीतर से कुछ फूटता है
केवल खोते नहीं लगाते हैं पखेरू
केवल लबनी नहीं टांगते हैं लोग-बाग
नहीं लगाते हैं मचान

अब मैं कहूंगा अपने को-नींद
उन्होंने बो दिये थे स्वप्न
वैसे कुछ और समझने के लिए स्वतंत्र था अपने-आपको
जैसे कि आग
लेकिन आग को जलनी चाहिए
सही मकसद से ही
हमेशा नहीं होते हैं बरतन करवाइन
नहीं तापता कोई अलाव पूरे साल
भरता पूरे दिन चीलम।

डर

कविता

अभिज्ञात

अब कोई भी चीज़ फेंस पर नहीं रहने दी जायेगी
हरेक को बंट जाना होगा अपने-अपने झूठे समर्थनों के बीच
प्रार्थना सभाओं में
अपनी मादा वृत्ति के साथ झुक जाती हैं-आस्थाएं

देवताओं के पास आशीर्वाद के लिए उठे हाथों की शक्ल में
लपलपती जीभें हैं
और जीभ की विडम्बना है वह चाहती है
एक पक्षीय सच के साथ कायम रहना
कई-कई आस्वादों के बावज़ूद

जीभ अपने स्वाद के बंटवारे और उसके सच से डरती है
और डर
हमेशा जहां-तहां आक्रमण की मुद्रा में दुबका मिल जायेगा।।

दोपहर

कविता

-अभिज्ञात

दोपहर है
गौरैया है उड़ान पर
सूने हैं उसके घोंसले
खाये भात के हल्के नशे में लेटे हुए हैं
उपनगरों के बंगाली दुकानदार
ओंघाती हुई दुकानों में
दफ़्तरों में बाबू, मौका पा

यह दोपहर है
घर से बाहर निकल पड़ोस में बतियाती हैं औरतें
छतों पर स्वेटर बुनते, पापड़ बनाते
सुखाते हुए अंचार, धोए हुए ब्रत की परसादी के गेहूं

दोपहर है
लगभग अपनी अंतिम नींद पूरी करने की
ताबड़तोड़ कोशिश में हैं अख़बार का प्रूफ़रीडर

यह दोपहर है
चश्मे ख़रीदने की वज़हों में से एक
ढलान के बारे में सोचते लोगों का आतंक

दोपहर में
परछाहीं के बिना सूनी पड़ जाती है काया

ऐसा क्यों है कोई नहीं गाता गीत खड़ी दोपहर के
शीर्ष है रोशनी का
पर कोई नहीं करता अगवानी

यह गति पर विराम है
मगर कोई नहीं देता-धन्यवाद
ऐसा क्या है दोपहर में
इतनी उपेक्षित क्यों है दोपहर?

हरियाली, पीठ और कविता

कविता

अभिज्ञात

भाई हो सके तो
हरियाली की फ़िक्र करो

अपने-आप खिले जायेंगे फूल
पक जायेंगे फल
हरियाली को कच्ची मत छोड़ो
मत छोड़ो अकेला़

हरे का अकेला छूट जाना
है छूट जाना संभावना का अकेले

अकेली, नि-संग अकेली संभावना
किसी बांझपन को चुपचाप ढोती है
जैसे पीठ
कुछ न कुछ हमेशा
बिना किसी असबाब के
स्वयं अपने आप को

बांझ पीठ का ढोया जाना
हरियाली के लिए ख़तरा है

कुछ न कुछ खोज लो असबाब

आख़िर पीठ पड़ जानी है अकेली
तुक मिलाने से न डरो
वह केवल कविता का कसीदा नहीं है
कविता शाब्दिक तुक मिलाये न मिलाये
वह भी मिलायेगी जीवन से
हरियाली और पीठ की तरह
अकेली निःसंग होने से

हरियाली, पीठ और कविता
तीनों को अलग-अलग मत छोड़ो
और हां फिर कहता हूं!!
मत करो फ़िक्र और फल की

वे ख़ुद-ब-ख़ुद पहुंचेंगे
सही समय पर
प्रतीक्षा न करो
बस इसे जानो
प्रतीक्षा में खो जानी है हरियाली
कठुआ जानी है पीठ
और कविता
उसे तुम ठुमरी कह सकोगे।

दी हुई नींद

कविता

अभिज्ञात

मैं खरीफ की फसल के बाद
सोऊंगा
सोऊंगा ज़रूर रबी की फसल के बाद
हहकारते खाली खलिहानों को
भर देने के बाद अन्न धन से

अन्न को अलगिया देने के बाद
पुआलो से
मैं होरहे की गंध के साथ सोऊंगा

बादल को न्योत लूं पहले
सूर्य को दे लूं अर्घ
घूर पर बार लूं दिये
ता लूं तमाम मूसों के बिल

फिर
फिर मैं सोऊंगा

मैं सोने के लिय ही तो करूंगा यह सब

कभी-कभी सोचता हूं
कि यदि न आने वाली होती नींद
तो
तो मैं क्या ज़वाब देता
अपनी हड़बड़ी का

यदि न आने वाली होती नींद
तो क्या सचमुच कर रहा होता यह सब
तब मैं क्या सोच रहा होता
यह सब करते हुए

कितना बड़ा आशीर्वाद है भगवन्
तेरी यह दी हुई नींद


Sunday, 18 January 2015

वापसी पराजय नहीं

कविता
-डॉ.अभिज्ञात
वापसी हो
टूटती लय की
रागिनी पर
आराम की
सिलवटें झाड़े बिस्तरों पर

मुस्कान की
थकी, उबासी लेती मनःस्थिति पर

टहनी पर वापसी
ऊंची उड़ान के बाद परिंदे की


अब हो वापसी, शब्दों में
कोमल संवेदनशील अर्थ की
जिसे छोड़कर भाग गये थे
नारों के डर से

सत्य में
सही आशय की
जो ग़लत समय में
ग़लत संदर्भ में, जाने जाते रहे बहुत बार।

नालें नहीं हैं

कविता
-डॉ.अभिज्ञात
इस विशाल अस्तबल में
बस लीद बची है और लगाम

घोड़े रौंद रहे हैं
जिस-तिस को
सबसे पहले
अपने होने के अर्थ को

घोड़े
अपनी अशालीन उदण्डता में
समझ बैठे हैं मुल्क को चारागाह

कैसा हो
दौर की सबसे छोटी और नाजुक कूद में
सहसे उन्हें पता चले
उनकी टापों में नाले नहीं है।।

Wednesday, 15 September 2010

तुमने मुझे जाना है

कविता

अभिज्ञात


कभी तुम
सूंघो
मेरी नाक से
गुलाब, मोगरा, गेंदा और अपने-आपको
छुओ
मेरे हाथों से
कविताओं की डायरी
मुझे भेंट की गयी पहली क़िताब
लो
मेरे ही होठों से
तुम अपना नाम
पहला, दूसरा और प्राइवेट वाला भी
करो
मेरे ही कानों से
अपने क़दमों के आहट की प्रतीक्षा
तब मैं जानूं
तुमने मुझे जाना है।

Tuesday, 7 September 2010

गांगी का हाल




कविता

अभिज्ञात


मेरा छोटा सा गांव कम्हरियां
दो तरफ़ से एक वर्तुलाकार नदी से घिरा हुआ
गांगी से
क्यों पड़ है नदी का नाम गांगी
मैं नहीं जानता
और अब, जानने का कोई उपाय नहीं
आजी नहीं रही, इस जिज्ञासा के जगने तक
गांव या पास के जीवित कस्बे मेंहनाजपुर से
कोई नहीं देता गांगी की ख़बर
ज़िन्दा लोगों के लिए
बेमतलब सी क्यों हैं नदियां
हैं भी तो ख़बर लायक क्यों नहीं
कैसे पार लेते हैं लोग गांगी
बिना उसकी खोज-ख़बर लिए-दिए?
शहर में कभी-कभी आती है
गांगी के प्रकोप की ख़बर
बाढ़ के कारण, वर्षा के दिनों में
क्या यह ख़बर गांगी की होती है
या उन ज़रूरतों की जो उपजती हैं
गांगी के कारण
गांगी के कारण
क्या सिर्फ़ उपजती हैं समस्याएं?
सोचता हूं
तो गांगी के करार सा
अरराकर ढहने लगता हूं
गांगी ने दिया है..यही
अपने नम करार सा मन
गांगी की ख़बर परासों की तरह
खो गयी है
जो गांव और गांगी के बीच कभी थे
जीते-जागते अद्भुत स्तम्भ
दूर, थोड़े ऊंचे से
पा लेते हैं हम अपना गांव
देखकर परास
उसके गह-गह, टह-टह करते फूल
वहीं परासों के उस ओर है गांव
इस ओर गांगी
दोनों परासों में देख सकता है कोई
क्या गांगी सूख गयी होगी
अब आ गया होगा नहर का पानी
बाढ़... सोचते हैं कुछ अरसा बाद लौटने वाले
या फिर कोई हो तो पूछते हैं एक दूजे से
अंदाजते हुए, लगाते हुए बाजी
संभालते हुए अपने जूते
जूते का उतरना
थकान के धुलने में सहसा शामिल हो जाता है
और क्या-क्या धोती है गांगी
बीरबल लोहार का छोटका बेहतर बता सकता है
सुबह उठते ही वह गांगी से मिलता है
ज़रूरत पर लगा देता है घाट पर अपनी टुटही डोंगी
कई-कई दिनों तक
पड़ी रहती है डोंगी बिन मल्लाह
जो जिस तरफ़ जाता है, लिए जाता है अपने साथ
पालतू कुत्ते की तरह
आज्ञाकारी हो सकती है डोंगी
डोंगी के बदले कितना अनाज़ पाता है बिरबल
साल भर में
यह जानने का कोई उपाय गांगी के पास नहीं
मुश्किल से एक बार
वह गयी थी बीरबल के घर बाढ़ में आधी रात
बिरबल का पुश्तैनी घर ही समूचा
चला आया उसकी अगवानी में सदा के लिए
मिट्टी, छप्पर समेत
बिरबल का घर गांगी में है
इस वह विश्वास के साथ कहता है
मगर गांगी का
इसे कोई नहीं कहता...।

Monday, 6 September 2010

चैता

कविता

अभिज्ञात

आलू मंडी में पहुंच चुके हैं
कसे जा चुके हैं बोरों में
गेहूं की बालियां खड़ी हैं खेतों में
रात-भर सिवान में सोता है हरवाह
पहरेदारी में

होरहे की गंध फिज़ा में तर है
और सबके चेहरे पर है उत्साह
रामनवमी है और रोहुआं गांव में है चैता
दुबे के दुआरे गांव-जवार से जुट गये हैं चालीस जोड़ी झाल
आख़िर तड़के ही निकले थे लोग
शाम होते-होते तय कर लिया लवंडा भी
जो तिवारी गांव में तमाटर का खेत अगोरता मिला
खुश हैं उसे देख सब
मुछें हैं सफाचट
जुल्फ़ें हैं बड़ी-बड़ी, एकदम चलेगा जी
रात सवा दस बजते-बजते शुरू हो गया
चैता
एक ओर है रोहुआं-तिवारी दूसरी ओर मेघा
पुरास, बहुआरा, बिगहीं, छितौनी
शुरू हुआ चैता
गा रहा है व्यास
व्यास की वक्राकार अंगुलियों पर
चालीस जोड़ी झाल पीटते झूम रहे हैं लोग
लवंडा बीच-बीच में लगा रहा है झटके
ताल की समरसता पर ओंघा रहे हैं सुनने वाले, दूर गांव से आये बूढ़े जवान
कभी-कभी झपकी तोड़ देती है टांसी बूढ़े की
खूब घी पिया है पट्ठे ने
सोचते हैं युवक, ऐसा लगे निकल आयेगा कलेजा टांसी का
एकाएक नींद तोड़ने को व्यास गाता है लटका
आंखे धोते अचानक उठते हैं सुनने वाले
उनकी नींद और सपनों में
बाद के कई महीनों तक पीछा करती है हो रामा की लम्बी तान
जिसे नापने का कोई पैमाना नहीं
कितनी लम्बी गयी तान
क्योंकि व्यास के पास हारमोनियम नहीं था
यह परखने का कोई उपाय नहीं था कि वह कितनी काली गयी उसकी आवाज़
कितना हुई बेसुरा
और इसकी गरज न थी
ठेठ चैता था-जिस पर झूम रहा था
पूरा गांव-जवार
भीतर-बाहर फैला था-चैता।

Friday, 3 September 2010

रिश्ता

कविता

अभिज्ञात


किसी भी समय दिख जाता है वह
अलस्सुबह, दोपहर, सांझ या रात में
उसके कंधे पर लदी होती हैं
कुर्सियां, सिर पर मेज़, हाथ में छोटा स्टूल
पीली मिट्टी पुते फ़र्नीचर
कच्ची लकड़ियों के

आदमी के ऊपर लदा फ़र्नीचर
कोई विस्मय पैदा नहीं करता, किसी में भी

आदमी फ़र्नीचर से लदा होता है
साधारण, बाबू किस्म का आदमी
वह भी जो फ़र्नीचर से लदा होता है
महसूस करता है फ़र्नीचर का बोझ

कैसा अद्भुत तादात्म्य है
लदा होना आदमी और फ़र्नीचर का
एक-दूसरे पर परस्पर एक साथ

फ़िलहाल वह जो बेच रहा है फ़र्नीचर
वह फ़र्नीचर ढो रहा है
फ़क्त वही

वह क्षण भर को सुस्ताने बैठता है
तो रख देता है ज़मीन पर मेज़, कुर्सियां, स्टूल खाली
और बैठ जाता है उकड़ूं
ज़मीन पर, कहीं छांह देख

कभी-कभी वह ले आता है
लकड़ी की अलगनी
मोहल्ले की औरतें जब करने लगती हैं मोल-भाव
कई बार वह कंधे पर अलगनी लिए-लिए
स्तब्ध खड़ा रह जाता है
मन में कुछ गुनता सा
पसीने से तर-ब-तर
मूर्तिवत्
उस समय लगता है
अलगनी पर कुछ गीले कपड़े लटक रहे हैं
और एक खोया सा मुखौटा
उसकी खूंटी पर टंगा है

कभी-कभी वह हद ही कर देता है
सिर पर पगड़ी रख लदा लेता है
मझोले कद की आलमारी
औरतें-बच्चे हंसते हैं
आलमारी इस तरह बेची जाती देख

वह बाज़ार नहीं जानता
न बाज़ार के नियम
ग्राहक और बाज़ार की परस्पर निर्भरता का अनिवार्य रिश्ता
जो आदमी को कभी-कभी
बाज़ार में छोड़ देता है बिचौलिए की तरह
और कभी-कभी
आदमी को ख़ुद हो जाना पड़ता है
बाज़ार

जब बहुत दिनों तक नहीं बिकते
उसके फ़र्नीचर
गीली-कच्ची लकड़ियों के पीले-फ़र्नीचर
उसका चेहरा पीला पड़ जाता है
फ़र्नीचर के रंग से
एकदम मेल खाने लगता है
और यही नहीं
सूखकर जगह-जगह से
टेढ़े होने लगते हैं फ़र्नीचर
उसका ज़िस्म फ़र्नीचरों के साथ-साथ
बेडौल होने लगता है
झुका-झुका सा।

Wednesday, 1 September 2010

उम्र

कविता

अभिज्ञात


अर्जित की जाती है
कंजूस बनिए सी
ख़र्च
सूद में से
टूट जाती है
आईने की तरह अचानक कच्च से
फूलहा परातों सी होती है उम्र
रखे-रखे ही
पड़ जाती है फ़ीकी जिसकी कलई
भीख सी बंट जाती है
इस-उस कटोरे में
आशीर्वाद की तरह
बिछी रह जाती है कई बार
किसी के लिए प्रार्थना मुद्रा में।

Sunday, 29 August 2010

ख़्वाब देखे कोई और

कविता

अभिज्ञात


मेरे साथ ही ख़त्म नहीं हो जायेगा
सबका संसार
मेरी यात्राओं से ख़त्म नहीं हो जाना है
सबका सफ़र

अगर अधूरी है मेरी कामनाएं
तो हो सकता है तुममें हो जायें पूरी

मेरी अधबनी इमारतों पर
कम से कम परिन्दे लगा लेंगे घोंसले

मैं
अपने आधू-अधूरेपन से आश्वस्त हूं

कितना सुखद अजूबा हो
कि
मैं अपनी नींद सोऊं
उसमें ख़्वाब देखे कोई और
कोई तीसरा उठे नींद की ख़ुमारी तोड़ता
ख़्वाबों को याद करने की कोशिश करता।

Wednesday, 25 August 2010

हूक


कविता

अभिज्ञात

एक हूक
गांव से काम की तलाश में आये
भाई को टालकर विदा करते उठती है परदेस में

एक हूक
जो बूढ़े पिता की
ज़िम्मेदारियों से आंख चुराते हुए उठती है

मां की बीमारी की सोच
उठती है रह-रह

बहन की शादी में
छुट्टी नहीं मिलने का बहाना कर
नहीं पहुंचने पर

मैं उस हूक को
कलेजे से निकाल
बेतहाशा चूमना चाहता हूं

मैं प्रणाम करना चाहता हूं
कि उसने ही मुझे ज़िन्दा रखा है

मैं चाहता हूं कि वह ज़िन्दा रहे
मेरी आख़िरी सांस के बाद भी

मैं आंख के कोरों में
बेहद सम्भाल कर रखना चाहता हूं
कि वह चुए नहीं

हूक ज़रूरी है
सेहत के लिए
हूक है कि
भरोसा है अभी भी अपने होने पर

हूक एक गर्म अंवाती बोरसी है
सम्बंधों की शीतलहरी में।